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बैसाखी पर्व (गुरु का सहारा)

 


सलाँ दी मुक गई राखी,ओ जट्टा आई वसाखी। गुरू गोविंद सिंह जी ने वैसाखी पर

खालसा पंथ की नींव रखी बैसाखी उल्लास का दो कारण

फसल कटाई का उल्लास नानक की साधना याद आई

हरियाली से आच्छादित प्रकृति ग्रामीण जीवन में समृद्धि लाई

आज के दिन दशम गुरू गोविंद सिंह नें खालसा पंथ की नींव रखी

तब जान न्यौछावर करने की सिक्ख भक्तो को सर देने की बारी आई

पांच शिष्य ही सामने आए जो पंच प्यारे कहलाए 

तब गुरू गोविंद सिंह ने इनको अमृत चखा कर शिष्य किया

 "प्रगट्यो मर्द अगमण वरियाम अकेला

वाह वाह गुरू गोविंद आपै गुरू आपै चेला" 

याद करें हम इस घटना को सिक्ख धर्म में बैसाखी के आध्यात्मिक महत्व को जानें

 "बैसाखी "अभिप्राय " सहारा"

अपंग पुरूष जिसके सहारे चलता है आध्यात्म दृष्टि से देखो तो गुरू ही अपणा सहारा है

अध्यात्म ज्ञान के बैसाखी से भवसागर तरन की बारी है गुरू गोविंद सिंह ने भक्तो को

नेकी पर चलने की शिक्षा दी स्वाधीनता संग्राम में जब 13 अप्रैल 1919 को

जलियाँवाला बाग मे रौलट एक्ट का विरोध किया तब जनरल ङायर ने निहत्थी

भीङ की हत्या करवाया अंग्रेजी सरकार के नृशंस कृत्य पर पूरे देश नें निंदा की

जलियाँवाला बाग की घटना बैसाखी पर्व को राष्ट्रीय रूप दिया

शहीद हुए उन लोगों को श्रद्धा सुमन समर्पित कर आओ मिलकर बैसाखी मनाएँ 


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