करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब
कड़ी धूप हो या सर्दी में तनिक नहीं करता आराम
पेट की भूख ,गृहस्थी का बोझ ,नन्हे से कंधे पर
खूब करे डटकर मजदूरी ,क्या था उसका गुनाह
करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब
घर में छोटा एक अकेला ,पिता का बेटा मान
माँ की आँख का पुतली और , जिगर का वो था चाँद
बहन के सपनो को पूरा करने का वो पहला आस
किंतु शिक्षा से वंचित बालक को न था अधिकार
करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब
उम्र ही क्या थी उस बालक की जिसके कंधो पर घर भार
वक्त के थोकर पेट की भूख से बिलख बिलख रोता नादाँ
वक्त ने वक्त से पहल उसकोे ,क्यों बना दिया नौजवाँ
करते हुए सब काम वो अपना ,देख रहा था ख्वाब
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें