ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ
मेरे जीवन की दहलीज पर तेरे क़दम
एक बार फिर मुझे याद दिलाएंगे
तेरे दिए ज़ख्म-ए- दर्द समेटती हूँ
जो सुकून छीना तूने बेवक्त रुलाकर
मैं बिखरकर खुद को उठाना चाहती हूँ
ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ
बीते दिनों में दर्द की गहराई में
ह्रदय प्रहार को सहन करती हूँ
आ मैं तेरा अभिनन्दन करती हूँ
वक्त की बदलाव को स्वीकारती हूँ
खुदी को घायल कर खुद को गुनहगार बना
तेरे दिए ज़ख्मो को तुझसे ही भरती हूँ
ऐ वक्त पुनःमैं तेरा स्वागत करती हूँ
इस बार जोरदार तरीके से
मेरे जीवन की दहलीज पर
तेरे एकाएक प्रहारों का सामना करते हुए
मैं झेल सकती हूँ हर दर्द तेरे समक्ष
क्रंदन करते ह्रदय में शांत सरोवर सी
नहीं होउंगी हताश किसी प्रहार से
ऐ वक्त पुनः मैं तेरा स्वागत करती हूँ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें