देश आजाद है ,लोग आजाद है दिमाग से नहीं अपितु शरीर से आज़ाद हैं
दलित नहीं, निम्न नहीं , उच्च नहीं, हिंदू नही मुस्लिम नहीं,अपितु हर वर्ग
हर स्त्री समाज में दोयम दर्जे को जी रही शोषण का शिकार होकर
लैंगिक उत्पीङन दहेज के विरूद्ध घरेलू हिंसा का शिकार
ये पुरूष प्रधान समाज या किसका है गुनाह
आज स्त्री ही स्त्री को शोषित करती है मां का दर्जा पाने वाली सास
बेटे के बंट जाने के ङर से अपनी ही पुत्रवधू को प्रताङित करती है
कुछ कीचड़ सभ्य सास,महिलाओं पर भी उछलता है
क्योंकि बेकसूर होकर भी इसी गुलाम समाज का हिस्सा हैं
बहुत भयानक है यह सामाजिक दृश्य जिसमें कोख में पल रही नन्ही जान को
अपनी ही पोती,बेटी, को मेट ङालती है एक नारी ही नारी पर कहर ढाती
सिर्फ पुत्र की लालसा में जो आज विकृत रूप ले चुका है
तब शरम से झुक जाता है सिर और सभ्य समाज का ढोल पीटने वाले
आज भी सभ्यता का ताज पहने बैठे हैं
वाकई हम कैसे कह दें कि हम गुलामी से आजाद हो गए हैं !!
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