भेदभाव की सीमाओं को पार करूँ बढते जाऊँ
नफरत ना हो दिल में मेरे इस बात को हर पल याद रखूँ
नदियों में पत्थर मारो तो शिकवा गिला नही करती है
जो आए उसके तट पर वह सबको शीतल कर देती है
मैं भी विधाता शीतल बनकर जीवन को सहज जीना सीखूँ
विष समान शब्दों को सुनकर पलटवार ना तीर चलाऊँ
जाना है तुझसे हे विधाता पापी से भी पापी नर में
जीवन प्राण तुम्हारा है
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