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मन और आत्मा का वार्तालाप

  

मैं उदास क्यों हूँ? आत्मा ने कहा तुम

स्वार्थ के वशीभूत हो गए हो

परंतु मन मानने को तैयार नहीं है

देखती हूँ कुछ दुष्प्रवृतियाँ जो निरंतर

मानव को पथभ्रष्ट कर रही है

हम अहंकार के वशीभूत होकर

स्वयं को अधिक ज्ञानवान मान लेते हैं

ये अहम ही पतन का कारण बन जाता है

सोचती हूँ काश हम सदैव ही

जिज्ञासु बनकर रहें तब खामियाँ

दुष्प्रवृतियां स्वत: ही समाप्त हो जाएँगीं!


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