मन की चंचलता खो देती है एकाग्रता खिंचाव इस जहान का
दूर करती है प्रभु से ! आत्मा तब कैद होकर मन के आगे हारे!
सत्य असत्य का भेद बताए , वही बेबस हो मन के आगे
मन के वशीभूत होकर जीव सत्य से विमुख हो जाता है
हरि चर्चा नित सुनकर प्राणी आत्मजागृति पुनः करे
अनहद धुन को श्रवण करे खुद में खुद को पा तृप्त रहे
देख नजारा अन्तस् आत्मा समाधिष्ठ हो जाती है
तब ये चंचलता अंधेरा मन से झट टल जाता है
अपने प्रियतम को पाकर आत्मा शुद्ध जो हो जाये तब
तोङ के नाता जमाने से अविनाशी धाम को जाती है।।
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