अंकुर जब फूटा तो खिलखिलाया
मुस्कराहट से उसने गुल खिलाया
पक्षियों ने आँगन में चहक बिखेरी
कलरव से भोर का आगमन हुआ
कण कण में संगीत का समावेश
रगों में रिसता संस्कारो का रक्त
धरा सृजन को कुदरत का उपहार
लहराये बाग़ बगीचे खेत खलिहान
सूरज की किरणें लालिमा बिखेरती
उस तेज किरण से छटा तिमिर
यद्यपि मानव रहे सदा धैर्यवान
मिटे मन अंध बने वह ऊर्जावान
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