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नश्वर जहाँ से वैराग्य

 

 हे निष्ठुर प्राण 

इस मिट्टी के घरोंदे को मुक्त कर दे

तेरी किरणें जो तिमिर मिटाती है

उस कोठरी को खाली कर दे

बेशक तिमिर किसे पसंद होगा?

कदापि नहीं, जड़ता किसे पसंद होगी?

इस भूतल पर नश्वरता किसे पसंद होगी?

हाँ चूँकि यह शाश्वत सत्य है छण भंगुरता

काल-गर्भ में प्राण रूपी भ्रूण की हत्या

यह सत्य ही परिलक्षित होता है

हे प्राण , अपनी समस्त ऊर्जा समेट ले

इस कोठरी को खाली कर दे 

जीवन एक मृगमरीचिका है ज्ञात हो गया

मृगतृष्णा पर अंकुश प्रबल हो चला ये

 देह छणभंगुर है किसका सगा हुआ है

आदि और अंत को मैने जान लिया है ।।

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