मेरा मन आज बहुत अधीर है
ह्रदय में उल्लासहीनता प्रबल बहुत
इस मन पर गहरा आघात पंहुचा
अकारण मैंने खुद से ही लोहा लिया
इस जंग का हश्र खुद की हार ही थी
जाने अनजाने अकारण ही मैं
अपनी ही खुशियों का गला घोंट बैठी
एक तमन्ना थी ,जहाँ से रुखसत होने की
जब मेरी अभिलाषाओं का अंत हुआ किन्तु
काल फाँस भी, यूँ ही अपना ग्रास नही बनाता
इस वार से मेरी चेतना बेहद आहत थी
तन पर जैसे बर्फ की सिल्लियां रख दी हों
जिस तरह उजड़े हुए उपवन की मुरझाई कली
अपने अस्तित्व में आने से पहले ही खाक हो गई
और धूल भरी दुर्भाग्य की आँधियों ने
अपने पाश में जकड लिए हों
इस मन के उष्णता में सिसकन थी
और ह्रदय की व्याकुलता ज्यों का त्यों
जैसे प्राणहीन अवचेतना मुझे शून्य करता
मेरे भय को मिटाता हुआ मुझे आवाज देता
संयोग वियोग से इस जहाँ से दूर करता
जैसे भीषण पछुआ पवनों के बहाव में
जनजीवन को अपनी ओर समाता है
तब स्थिति बेकाबू सी हो जाती है
कुछ ऐसा ही बना रहा प्रलय सा
इस अधीर मन की अवचेतना में...!!
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