राष्ट्र की प्रतिभा ,युवा, जवानी
जनसँख्या पर बलि चढ़ी है
लोभ,प्रलोभन,घृणित राज में
सुशासन पर भारी पड़ी है
अर्धविक्षिप्त अवस्था में
सड़कों पर प्रतिभाएं पड़ी हैं
चंद सोने के सिक्कों खातिर
मर्यादाएं यहाँ धरी पड़ी हैं
कृषि, व्यवस्था की हालत
वस्तु मूल्यो में इजाफा हुआ
जीवन का आसार नहीं है
प्रकृति का कोप बढ़ा है
इस धरती की सभी धरोहर
माफियाओं ने सोख लिया है
मान लो अब इस देश में यारों
लोकतंत्र औंधे मुँह पड़ा ।।
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