जब मैं सिर झुकाती हूँ तेरे दर पर
मुझमें आत्मिक चेतना जाग उठती है
जैसे कोई निर्जीव पौधा पुन: जिवित हो उठा
आभास ही कुछ एैसा है कि
वाणी और स्वर दोनो मंत्तमुग्ध हो गए
नतमस्तक हूँ मैं तेरी उदारता देख
दुर्भाग्य है उनका जो हंसते हैं
तुझसे प्रेम करने वालों पर......!!
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