सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्वार्थ वशीभूत



स्वार्थ वशीभूत होकर जब तुम ठोकर औरों को देते हो

अपने सुख सुविधा के हेतु दया धर्म सब भूल गए

जाने क्यों क्षणिक सुखों को स्थिरता से जोङ दिया

मत भूलो इक दिन सब कुछ इस धरा पर ही रह जाएगा

जिसके सुखी जीवन के लिए जमा किए सामान सभी

उसने ही तुम्हे घर से निकाला लाचार बना ये जीवन है

तुम खुद सोचो जो कर्म किया पुत्र को भी वही सीख मिली

आज तुम्हारी जो दशा बनी है उस कर्म फल का भुगतान करो

स्वर्ग नर्क है इसी जहां में मरणोपरांत का क्या कहना

जैसी करनी वैसी भरनी सत्य है यह असत्य नही


टिप्पणियाँ