रोक सकते हो क्या तुम
सृष्टि के विस्तार को
कैद सकते हो क्या तुम
उङते पंछी की उङान को
बदल सकते हो क्या तुम
खारे दरिया को मिठास में
स्थिर कर सकते हो क्या तुम
काल की निरंतर चाल को
क्या कर पाओगे तुम ऐसा ?
शायद नहीं! कभी नहीं!
तो कैसे रोक सकती हूँ मैं
अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को
दर्द से कराहती मानवता का स्वर
प्रकृति से कूपित विध्वंस का स्वर
खुशी से भरा ,उल्लास का स्वर
मेरी संपूर्ण अभिव्यक्ति का स्वर
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