मेरे शब्दों को लयबद्ध ही रहने दो
पंक्तियों की लङियों में मैने
हर एक फूल सजाए हैं
बहते अश्कों के कतरों से
हृदय में शूल लगाए हैं
गम के बादल खुशियों के पल
दोनों का पुष्प लगाया है
कांटों के सफर फूलों सी महक
स्मृति में अपने संजोए हैं
मेरे मनोभावों का रूप स्वत:
मुझको ही तय कर लेने दो
कुछ व्यक्त करूँ अव्यक्त रखूं
कुछ भावों को मैं गुप्त रखूं
जो कहना है वह कह ङालूं
मत भार हृदय में रहने दो
मुझे मेरे ही मनोभावों में
मेरे शब्दों को परिणत होने दो
वो भाव जो हर प्राणी में छिपा
जो मेरे वेदन से है लिखा
उन भावों को सृजित रूप देकर
साहित्य धरा पर बहने दो
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