दशहरा खुशी का पर्व जिस दिन खुल जाते हैं
मुक्ति के दस दरवाजे ,दस रावण छिपा बैठा
मानव तन के भीतर ,आज चहुं ओर दिशा में
रावण का प्रतिबिंब जले , खुशी से हम झूम उठे
छण भर के आतिशबाजी मे, ध्वस्त हुआ रावण प्रतिमा
वाह कितना आसान लगा, रावण के प्रतीमा को मिटाना
काश इतना ही आसान होता, हमारे अंदर छिपे आवेश द्वेष
घृणा और अहंकार का रूप, उस रावण को मिटाना!
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