तुम्हारा आना जाना लगा रहता है तो सुनो
हमेशा के लिए हमारा दामन छोड़ दो ना
मजबूरियों का बेहिसाब रोना अच्छा नहीं
अपनी तकदीर को कोसना छोड़ दो ना
जब सालों से ब्लॉक किया था तुमने हमें
तो आज क्यों अनब्लॉक किया बताओ ना
तुम जानते हो कि अब कोई फायदा नहीं
तो आज फिर से हमें ब्लॉक कर दो ना
तुम्हारी खामोशी जो तकलीफ देती थी हमें
अब यूं ही खामोश रहना सीख लो ना
जहां भी रहो अपनी दुनिया में खुश रहो
हमारी यादों को जहन से मिटा दो ना
मत करो अपनो को नाराज हमारे लिए
एक बार फिर से हमे ब्लॉक कर दो ना
हम जी रहे हैं और जी लेंगे तुम्हारे बिना
हमारा साथ एक ख्वाब रहा मान लो ना
वक्त बेवक्त जहन में आ ही जाते हो तो सुनो
हर लम्हा हर घड़ी हमें सोचना छोड़ दो ना
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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