शहर रोजगार के लिए हो गए
गांव सिर्फ याद के लिए हो गए।।
वो महुआ वो आम वो काफ़ल
वो बगिया वो मचान वो पगडंडी यादगार हो गए
शहर में अपने गैर और गैर मददगार हो गए
संयुक्त परिवार का बिखेर रिश्तो में विक्षोभ हो गए।।
बच्चे उड़ चले डिग्रियों के पर लगाए
बुजुर्गों पर सितम ऐसा घर उजाड़ हो गए ।।
ये पेट की भूख दाने दाने और निवाले को जूझना
सरकारी नीतियां और दावे सब बेकार हो गए ।।
गांव सिर्फ याद के लिए हो गए।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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