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नया साल नई उम्मीद ( गज़ल)

 

पतझड़ के बाद भी जिंदगी है ।
अंत से प्रारब्ध ही जिंदगी है ।।

अश्क जब पत्थर बनकर थम  जाए।
जज्बातों पर काबू पाना ही जिंदगी है ।।

ना हो मायूस  कि उजड़ा जहां है तेरा।
उम्मीदों का गुल खिलना ही जिंदगी है ।।
 
राख के ढेर से माथे का तिलक सजा।
ख़ाक से चिंगारी होना ही जिंदगी है ।।

दौर  बुरा ही सही ना हताश होना ।
भाग्य कर्म का खेल ही जिंदगी है।।
 
कुछ रिश्ते बचाने  के खातिर ही सही।
अपनों से हार जाना ही जिंदगी है ।।

यूं हालातों से आखिर  तक ना हार मान
तकलीफों से लड़ना ही जिंदगी है ।।

साल आएगा जाएगा यूं ही हर साल ।
नए उम्मीदों का खिलना ही जिंदगी है।।

लता सी नाजुक चट्टान सा दमखम लिए ’गुंजन’
बिखरकर खुद में संवरना ही जिंदगी है ।।

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