पतझड़ के बाद भी जिंदगी है ।
अंत से प्रारब्ध ही जिंदगी है ।।
अश्क जब पत्थर बनकर थम जाए।
जज्बातों पर काबू पाना ही जिंदगी है ।।
ना हो मायूस कि उजड़ा जहां है तेरा।
उम्मीदों का गुल खिलना ही जिंदगी है ।।
राख के ढेर से माथे का तिलक सजा।
ख़ाक से चिंगारी होना ही जिंदगी है ।।
दौर बुरा ही सही ना हताश होना ।
भाग्य कर्म का खेल ही जिंदगी है।।
कुछ रिश्ते बचाने के खातिर ही सही।
अपनों से हार जाना ही जिंदगी है ।।
यूं हालातों से आखिर तक ना हार मान
तकलीफों से लड़ना ही जिंदगी है ।।
साल आएगा जाएगा यूं ही हर साल ।
नए उम्मीदों का खिलना ही जिंदगी है।।
लता सी नाजुक चट्टान सा दमखम लिए ’गुंजन’
बिखरकर खुद में संवरना ही जिंदगी है ।।
शब्द गुँजन में आप सभी पाठकगणों का हार्दिक स्वागत है । यहाँ प्रकाशित समस्त लेख , कहानी, कविता, मुक्तक, गीत, आध्यात्मिक अभिव्यक्ति , मनोविज्ञान , परामनोविज्ञान आदि समस्त शाखों से जुड़े तथ्य , रहस्य , मेरी स्वरचित स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है जिस पर मेरा मौलिक अधिकार है। अतः पाठकों से निवेदन है कि किसी भी तरह कंटेंट्स को तोड़ मरोड़कर अन्यत्र पेश ना करें । अन्यथा दोषी पाए जाने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत आप पर कार्यवाही की जाएगी । गुंजन अभिव्यक्ति को अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आप सभी का धन्यवाद!!
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