कर्मपथ की ओर
उठो इस गहन मुद्रा से , समाधि प्राण साधे हो
बनो अर्जुन धनुर्धारी , ऊर्जा के स्रोत भारी हो
यूं ही एकांत प्रिय रहना भला कैसे कहें बेहतर
लौट जाओ ध्रुव घर को पिता का हृदय बैठा हो ।।
बाधा से परे
घिरने लगो मझधार में तो प्राण साध लो
बहिर्मुखी इंद्रिय ग्राहय विषयों को तुल ना दो
बाधा जीवन की संपदा ईश्वर की भेंट है
इच्छाशक्ति के बल से ही निर्वाण को चलो।।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें