इश्क में रोष हो इश्क में होश हो
जिंदगानी में शामिल कोई खास हो
एक सफर जिंदगी का हो एकाकी क्यों
अंतस एहसास हो दिल ये गुलबाग़ हो ।।
अपना होकर भी वो ना हमारा हुआ
वादे करके ना वो ख्वाब झूठा किया
इश्क के राहों में पल दो पल खास हो
विक्षोभ वनवास से प्यार कुछ कम ना हो ।।
हसरतो का समंदर उफानों पर है
धड़कनों में हरारत उफानोंं पर है
कैसे कह दूं मेरा दिल हो पत्थर शिला
जोड़ियां तो बनी आसमानों पर है ।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें