*अपने ही जख्मों को बार बार कुरेदती हूं मैं
दिल में उठते एहसासों को लफ्ज़ देती हूं मैं
लोग सिर्फ ठहांके लगाकर जुड़ते हैं मुझसे
आखिर हर बार वही गुस्ताखी करती हूं मैं ।।
* तुम जा रहे हो जाओ फिर लौट कर मत आना
अपनी किताब लिए जाओ यह एहसान कर जाना।।
*सिर्फ हम ही मगरुर नहीं मुजरिम तुम भी कम नहीं
अब शौक से लौट जाओ हमें खातावर ना ठहराना ।।
*ये चांद ये तारे और सूरज क्या जहां को रौशन करते हैं ।
सुना है ये ईशकजादों को ये बेहद गमजदा करते हैं ।।
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