कभी खुशियां हमारी थी कभी एक वक्त अपना था
कभी लाखों बहाने थे कभी गम का ना कतरा था
जुदा होकर के अपनों से जन्मदिन क्या मनाते हम
पुनः इस बार खुशियों में लम्हा गुजरा सताया था।।
सेवी भावो से कर्तव्यों को मिलकर के निभाते थे
किसी संकट में हम सब साथ एक दूजे के सम्बल थे
सामाजिक क्रूर व्यवस्था से किनारे पर खड़े हैं अब
वक्त करवट ना बदले तो हम भी अपनों में शामिल थे ।।
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