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इश्क के दहलीज पर (गजल)

 

तेरे इश्क के दहलीज पर सिर रखा है
तू सजदा समझ या मेरा गुरुर रखा है

मुझमें मैं तो नहीं बस तू ही तू समाया है
इस दिल ए आंगन में तेरा ही बसर रखा है

 एक भरम है तुझसे बिछड़ ना जाऊं कहीं ।
इस बाबत तेरा दामन हमने पकड़ रखा है।।
 
 तू मशगूल है अपनी दुनिया में इस कदर
कि तेरे इंतजार में दिल पर पत्थर रखा है

लौट आएगा मेरे कहने पर कैसे मान लूं
तेरी जिंदगी में मेरा क्या मकाम रखा है

तू खुश रह जहां भी रहे बस यही दुआ है
ऐ दोस्त जा तुझको मैने आज़ाद रखा है ।।

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