जब मेकप में लडके लड़कियों को देखते हैं तो आह और वाह दोनो से रूबरू होते हैं इसी पर आधारित एक हास्य काव्य है छोरी और छपरी .........
क्या खूब लगती हो बड़ी विचित्र दिखती हो
रंग गोरा है लेकिन क्यों नाखुश सी दिखती हो
ये मेकप शेकप से बढ़िया (सीधी साधी ही रहना)2
हाए....!चक्कर खा गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!
अब चूंकि लड़की को गुस्सा आ जाता है और कहती है कि तुम्हारी तो अकल ठिकाने पर होनी थी .......... कि........
चेहरा क्या देखते हो (घुटने में मेमोरी हमारी है) (२)
हमसे अकलमंद हो तो हम पर क्यों लट्टू होते हो
हमें कायाकल्प सौंदर्यनीखार(पार्लर में देखा तो )२हाए..
चक्कर खा गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!
समस्या इतनी गंभीर नहीं है जितना की हम अनुमान लगाते हैं .........थोड़ा अकल से काम ले तो बहुत से हादसों का शिकार होने से बच सकते हैं .....
थोपे लिपिस्टिक जुल्फें कैरेटिन नकली नखून रंगे
बलखाती मदमाती छोरी के पीछे कितने छपरी पड़े
ब्यूटी प्रोडक्ट्स हाई हील (अदाओं में उलझा गुंजन)2
हाए....! चक्कर खा गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!
माशाल्लाह.. माशाल्लाह...!! धन्यवाद
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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