सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हास्य गीत छोरी और छपरी

 

जब मेकप में  लडके  लड़कियों को देखते हैं तो आह और वाह दोनो से रूबरू होते हैं  इसी पर आधारित एक हास्य काव्य है  छोरी और छपरी .........
क्या खूब लगती हो बड़ी विचित्र दिखती हो
रंग गोरा है लेकिन क्यों नाखुश सी दिखती हो
ये मेकप शेकप से बढ़िया (सीधी साधी ही रहना)2
हाए....!चक्कर खा  गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!


अब चूंकि लड़की को गुस्सा आ जाता है और कहती है कि तुम्हारी तो अकल ठिकाने पर होनी थी   .......... कि........
चेहरा क्या देखते हो  (घुटने में मेमोरी हमारी है) (२)
हमसे अकलमंद हो  तो हम पर क्यों लट्टू  होते हो
हमें कायाकल्प  सौंदर्यनीखार(पार्लर में देखा तो )२हाए..
 चक्कर खा  गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!

समस्या इतनी गंभीर नहीं है जितना की हम अनुमान लगाते हैं .........थोड़ा अकल से काम ले तो बहुत से हादसों का शिकार होने से बच सकते हैं .....

थोपे लिपिस्टिक जुल्फें कैरेटिन नकली नखून रंगे
बलखाती मदमाती छोरी के पीछे कितने छपरी पड़े
ब्यूटी प्रोडक्ट्स  हाई हील (अदाओं में उलझा गुंजन)2
हाए....! चक्कर खा  गिर गया वो छोरा .....माशाल्लाह!!

माशाल्लाह..   माशाल्लाह...!! धन्यवाद


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धूप छाँव सा जीवन

  खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा  जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल  तले नभचर  ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

अध्यात्म एक रहस्य

  अध्यात्म एक रहस्य अध्यात्म रहस्य अति गूढ़ है,अपनी मति से जान जितनी आंतरिक यात्रा, उतनी ही पहचान अध्यात्म अलौकिक ज्ञान है ,विज्ञान फेल हो जाय स्वांसों की  इस डोर को , पकड़ सके ना कोय साधना के आकाश में प्राण-अपान के बीच योगी साधक ,साधिका ,साधे प्राण की डोर स्वेच्छा मृत्यु सहज योग, काल खड़ा जब पास काल के धावा बोलते , योगी हो लवलीन जल समाधि राम लें लक्ष्मण सरयू आये वाणशैया पर लेटे ही भीष्मपितामह जाये विवेकानंद समाधि में प्राण साध जग छोड़े गुरु मिले सम परमहँस , सहज योग तब होय अध्यात्म सहज क्रिया-कर्म, तंत्र-मंत्र ना जान भूत-प्रेत ,सब देवता , मोक्ष तत्व से दूर मानव का तन दुर्लभ है , मिले ना बारम्बार टूटा हुआ पत्ता नहीं , कभी शाख पर आये लाख़ 84 जन्म  है ,  जीव काल  का  ग्रास आत्मज्ञान जब तक नहीं, नर ना तरे भव पार।।

Deep pain पीड़ा

  पीङा क्या है ?क्या यह मात्र  आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते  हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।  पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं। यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता  है कि पीङा क्या शारीरिक  होती है या केवल मात्र मानसिक ? जिसका आभास केवल जागृति में है य...