सेवक का भाव
मुझे हर सुख दिया मालिक नहीं महरूम रक्खा है
तेरी सेवा मिले कण भर ना ख्वाहिश ढेर रक्खा है
मिला जितना मुझे दर से बहुत उपकार है तेरा
नमन तुझको करूँ मालिक ख्वाहिशों में क्या रक्खा है।।
वनवासी सेवक लक्ष्मण
सेवक शव में कोई ना अंतर तपवन देह करे हैं ये
वक्त कठिन हो पीर घने पर पल पल धीर धरे हैं ये
कष्टों के पर्वत बन लोग डिगायें जब भी लांछन से
एक आस प्रभु नेह लगाये जग से नेह तजे हैं ये ।।
कलियुग में राम नाम
अयोध्या से विदा लेकर चले श्री राम जंगल में
भटकते कुटी में ऋषियों के राक्षसी दैत्यों से लड़ते
सिया का धर्म पतिव्रत था लखन का प्रेम अनुपम था
चरित पावन राम गाकर हो पावन लोग कलियुग में।।
सीता की पवित्रता पर लांछन
नियमों ने बांधा है हमको रीति रिवाजें जकड़े हैं
मोह के धागे बंधु बांधव मित्र सम्बन्धी पकडे हैं
सन्यासिन बन जीवन जीना सरल नहीं दुश्वार हुआ
कदम कदम पर लांछन मिलना मन वैरागी समझे है।।
वनवासी जीवन का कष्ट
कहने को कुछ नियम उचित है जीवन कठिन तपस्या हो
पशु सा खाना पीना सोना जीने का नहीं मकसद हो
महामानव बनने के सफ़र में मानव कुछ तो त्याग करे
तन को शव सा थिर कर राखे मन उत्कृष्ट तपस्वी हो। ।
लक्ष्मण का सेवा भाव
सेवक धर्म निभाना समझो अंगारे पग पग पर है
शब्दों के तलवार यहाँ मन भेदन को कुछ कम ना है
ज्ञान योग से मन को साधे तन तपवन गर कर पाओ
भवसागर से पार उतरना नामुमकिन सा कुछ ना है।।
ज्ञानी कैसा हो??
बनो शबरी सुदामा सा, ज्ञान का दम्भ ना करना
करो पूजा अगर ईश का , भक्ति का मान ना करना
हनन होता है अक्सर दम्भ का और क्रोध, मद, मन का
विकारों से भरा हो मन , वैतरणी पार ना होता।।
ज्ञान और भक्ति
सेवक सेवा में रहे और ज्ञानी समाधि में खोये
अर्जुन हनुमंत उधौ गोपी ग्वालों का पृष्ट टटोलें
भक्ति पथ तलवार धार है सहज कहाँ लखन तप था ?
ज्ञान योग से उधौ हारे हार गए मंत्रिवर अक्रूर।।
कर्मों का खेल
कर्म का खेल है न्यारा सजा बिन दोष ना देना
अपनी महत्वाकांक्षाओं के हेतु अहितकर काम न करना
अगर मिल जाये पदवी नाम और सम्मान तो जग में
पतन होता है दंभी का , भाग्य को दोष ना देना।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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