सुबह शाम रोते हैं दिन रात कहते ये कवियों की महफिल है कवियों को सुनते
मेरा बिंब तुममें तेरा गीत मुझमें ये दुनिया की कश्ती में साहिल को कहते
क्यू दर्पण है सुना या चेहरा है मुर्झा ये होठों पे सिसकन ये आंखो का दरिया
बयां करते हैं ये सभी चिन्ह मेरे क्यों मुझमें है गूंजे कोलाहल सा गुंजन
मै खुद में सिमटकर जमाने से छिपकर स्वयं से स्वयं को बहाओं से थमकर
कि दो पल सिसकर हां आंसू बहाकर ले होठों पर मुस्कान गमों को छिपाकर
हृदय पीर ख्वाबों ख्यालों के रास्ते दो पन्नो के धरती पर आंसू से कहते
उठा दिल के अरमां सितम ढा दो सारे लिखो होके तन्मय हृदय गीत प्यारे
ना कहना किसी से ना खुद को भुला दो , रवानी बदलती बहारों से कह दो
मेरा वक्त जाया करे ना जमाना उठूंगी जो गिरकर स्वयं से संभलना
वो कर्ता तो गढ़ता स्वयं से जहां को तो कवि से साहित्य को आयाम मिलता
प्रखर हो के चमको जहां को बता दो नहीं गम में डूबे हो वादा ये खुद से
सुबह शाम रोते.......
यही पक्ष बेहतर है संसार सृजन कला संस्कृति ज्ञान विज्ञान उत्तम
ये समुदाय अपना ( कक्स्टिसम नहीं कवि समुदाय है) बुलंदी को छूता रचे काव्य सुंदर फुहड़ता से उत्तम
जवानों के सम्मान में वीर बेहतर कि श्रृंगार रूपक हो अतिशयोक्ति बेहतर
करुण रौद्र या हो विभत्स नाद गूंजे हो मुखरित आवाजें कलम से हमारे
सुबह शाम रोते.......
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