मुझमें बसा यादों का एक घरौंदा है ।
हंसी लबों पर नकली एक मुखौटा है।।
उसे फिकर है मेरी मगर वो मेरा नहीं ।
दिल मेरा हर बार बिखरकर जुड़ता है।।
दूर बहुत है सुकून भरा वो चांद मेरा ।
उसके दीदार को दिल मेरा तरसता है।।
इश्क ए बहारों में आशिक ठौर कहां पाए।
दिल बंजारों सा मारा मारा फिरता है । ।
लैला मजनू के किस्से खूब सुहाए जिन्हे।
वो आशिक आवारा मनचला कहाता है ।।
अपनी मौज में सुखी रहो गर सिंगल हो।
दिलों में हलचल करके इश्क रुलाता है ।।
जज्बातों से खेल ये इश्क नहीं गुंजन ।
अश्कों से अनुबंध अगर ना आता है।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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