भक्ति में भाव विकृत हो तो ठोकर से जगाना तुम
तेरी सेवा से मन भटके तो दर्शन से उठाना तुम
मेरे अंग संग सदा रहना मेरे अंतस में हे ईश्वर
खुशी के अंगिनत पल मे माया से बचाना तुम।।
ये पल मेरा हो अंतिम तो सफर में तुम ही संग रहना
मुझे खुद से गिला ना हो सहायक तुम सदा रहना
कठिन पल हो या दुःख घेरे या रौनकें हो जमाने की
कमल पुष्पों सा मन निर्लिप्त निर्मोही मुझे रखना।।
छणिक सुख में जो भूलूं मैं तेरा दीदार मुश्किल हो
विषय सुख में ये फूले मन तेरी रहमत आसां ना हो
अगर दुनिया के सुख में मन सदा डूबा रहे फिर तो
मुझे देना जन्म दूजा ठौर तेरा परम पद हो । ।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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