अंतरराष्ट्रीय साहित्य परिषद क्रमांक : 2273
शीर्षक : राम प्रभु की प्राणप्रतिष्ठा
श्री राम जन्म भूमि पर मंदिर पुनः बनाया है
कलियुग में श्री राम नाम का बज रहा डंका है
दर्शन करने को आतुर श्रद्धालुजनो की भीड़
मिली जीत ऐतिहासिक इक पल लगता सपना है।।
बोलो जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
मृगशिरा नक्षत्र के शुभमुहूर्त में हो शंख नाद
देश में लहर उठी है घर घर गूंज रहे सिया राम
राम चैतन्य विराजें सफल हो प्राण प्रतिष्ठा काज
लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई है नहीं रहा अपवाद !!
बोलो जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
मेरा भारत अमर रहे बने विश्वगुरु पहचान
धर्म विज्ञान के समायोजन से होगा देश महान
राम राज्य की परिकल्पना किया था गांधी ने
राममय हुआ समूचा भारत जान गया ये जहान ।।
बोलो जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
विद्रोहीयों का काम है हर एक काम रोड़ा डालें
अपने देश में रहें परंतु बिरयानी पड़ोसी खाएं
चिंता फिकर नहीं चाहें जितना जोर लगाए वो
तुम जपना श्री राम अमंगल बजरंगी टालें ।।
बोलो जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
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खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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