सोचती हूं जिंदगी को जख्मों के हवाले कर दूं।
कुछ इस तरह खुद को मैं मशगूल कर दूं ।।
उड़ना चाहूं तो इन पैरों में छाले हो अरमानों के
तेरे इश्क में उलझकर खुद को ही जंजीर कर दूं।।
ना खोल सके इश्क ए बेड़ियां दिलों का कोई ।
तेरी खूबियों के किस्से हर दिल अजीज कर दूं ।।
मुझे मेरी फिक्र ना हो ना तू मुझसे जुदा हो
मैं तुझमें ही फना हो खुद को मशहूर कर दूं ।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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