इश्क और तन्हाइयो का वास्ता पुराना है यारों
दिलों से खेलने वालों को दरकिनार रखा जाए ।।
जो कद्र ना कर सके सजदे में आए फूलों का
तो उन्हे उसकी खुशबूओं से महरूम रखा जाए ।।
ना पायमाल हो इश्क ए जुनून में रख हौसला
कि मंजर उदासी का वो दौर भुलाया जाए ।।
अंदाज अपना अलग हो महफिल में मुस्कुराने का
तो गमों से कह दो वो होठों की दहलीज से चले जाए।।
जो लड़ सके हालातों से मुस्कुराते हुए गुंजन
वह शख्स खुद में मुकम्मल किरदार लिखा जाए।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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