आज का दिन है सबसे भारी , काटेगा मच्छर कर लो तैयारी
खिड़की डोर खुले हैं सारे , वाह वाह क्या हवा सुहानी
कोना कोना धूल उड़ाए आंधी बवंडर लेकर आए
आज तो अपनी शामत आई मच्छर धीरे धीरे टपके
बर्तन धोए खाना पकाए मईया बोली हाय री दईया
मच्छर अब ये कहां से आए डोर खुला हमलावर आए
गुस्से में हो आग बबूला , पिटे दनादन दीदी भैया
मैं छोटा बचकर जा दुबका, मईया के आंचल जा लिपटा
मुझे दुलारे एक हाथ से दूजे हाथ में डंडा उठाए
छिपकर आंचल से मैं देखूं दीदी भैया की खूब पिटाई
सोचा क्यों ये रोब जमाते मैं छोटा हूं तो मुझे डराते
मैने भी तरकीब निकाला , रोज खुले खिड़की दरवाजा
मईया इनको पीट पीट कर मच्छर जैसा सबक सिखाए
आओ मच्छर राजा आओ झुंड बनाकर इन्हे सताओ
मैं खोलूंगा रोज दरवाजा मच्छर मित्र सभी आ जाओ
बारिश में तुम ढेरो आना अपनी टोली साथ ले आना
मैं आने का निमंत्रण दूंगा संध्या ढले चुपके से कहूंगा
मईया मईया देखो भैया आज गए हैं सैर सपाटा
डेंगू मलेरिया से ना डरूंगा पूरे कपड़े पहना करूंगा
छोटा हूं सब लाड करेंगे मैं मच्छर संग हास्य करूंगा।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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