सुख के तिनके तिनके लम्हें दुःख की सांझ में ढलते हों।
राहें कठिन हो हो जाए तुम अपना मनोबल बढ़ने दो।।
खुशियों की उड़ाने रद्द होने से मन का विचलन बढ़ जाए ।
इच्छा मिटे तो मिट जाए खुद पर से यकीं ना मिटने दो ।।
चींटी के लघु क्षमता से हाथी का वजन ना तोलो तुम।
घायल मन हो हो जाए बस खुद पर भरोसा रहने दो ।।
थिरक उठे बारिश में मयूर प्रकृति राग सुहानी हो ।
मूड खराब हो हो जाए मुस्कान अधर पर रहने दो ।।
जीवन के आपा धापी में जब रिश्ते बोझ से लगते हों ।
गांठ लगे तो लग जाए कुछ निर्णय वक्त पर रहने दो ।।
धुंध घिरे पथ कोहरे से विजिबिलिटी शून्य हो जाए तो।
कदम डिगे तो डिग जाये प्रगाढ़ आत्मबल रहने दो।।
वृक्षों से लिपटी लता खिलीं ये हंसी अदाऐं मस्तियां ।
ख्वाब मरे तो मर जाए कुछ नए ख्वाब को बुनने दो ।।
एक मुद्दत से अरमानों के लौ को यूं बहकने दो ’ गुंजन’
हया मिटे तो मिट जाए मन मस्त मगन मन रहने दो।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें