पतझड़ के बाद भी जिंदगी है ।
अंत से प्रारब्ध ही जिंदगी है ।।
अश्क जब पत्थर बनकर थम जाए।
जज्बातों पर काबू पाना ही जिंदगी है ।।
ना हो मायूस कि उजड़ा जहां है तेरा।
उम्मीदों का गुल खिलना ही जिंदगी है ।।
राख के ढेर से माथे का तिलक सजा।
ख़ाक से चिंगारी होना ही जिंदगी है ।।
दौर बुरा ही सही ना हताश होना ।
भाग्य कर्म का खेल ही जिंदगी है।।
कुछ रिश्ते बचाने के खातिर ही सही।
अपनों से हार जाना ही जिंदगी है ।।
यूं हालातों से आखिर तक ना हार मान
तकलीफों से लड़ना ही जिंदगी है ।।
साल आएगा जाएगा यूं ही हर साल ।
नए उम्मीदों का खिलना ही जिंदगी है।।
लता सी नाजुक चट्टान सा दमखम लिए ’गुंजन’
बिखरकर खुद में संवरना ही जिंदगी है ।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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