कभी खुशियां हमारी थी कभी एक वक्त अपना था
कभी लाखों बहाने थे कभी गम का ना कतरा था
जुदा होकर के अपनों से जन्मदिन क्या मनाते हम
पुनः इस बार खुशियों में लम्हा गुजरा सताया था।।
सेवी भावो से कर्तव्यों को मिलकर के निभाते थे
किसी संकट में हम सब साथ एक दूजे के सम्बल थे
सामाजिक क्रूर व्यवस्था से किनारे पर खड़े हैं अब
वक्त करवट ना बदले तो हम भी अपनों में शामिल थे ।।
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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