सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कवियों की दुखती रागिनी

 

सुबह शाम रोते हैं दिन रात कहते ये कवियों की महफिल है कवियों को सुनते
मेरा बिंब तुममें तेरा गीत मुझमें ये दुनिया की कश्ती में साहिल को कहते
क्यू दर्पण है सुना या चेहरा है मुर्झा ये होठों पे सिसकन ये  आंखो का दरिया
बयां करते हैं ये सभी चिन्ह मेरे क्यों मुझमें है गूंजे कोलाहल सा गुंजन

मै खुद में सिमटकर जमाने से छिपकर स्वयं से स्वयं को बहाओं से थमकर
कि दो पल सिसकर हां आंसू बहाकर ले होठों पर मुस्कान गमों को छिपाकर
 हृदय पीर  ख्वाबों ख्यालों  के रास्ते दो पन्नो के धरती पर आंसू से कहते
उठा दिल के अरमां सितम ढा दो सारे लिखो होके तन्मय हृदय गीत प्यारे

ना कहना किसी से ना खुद को भुला दो  , रवानी बदलती बहारों से कह दो
मेरा वक्त जाया करे ना जमाना  उठूंगी जो गिरकर स्वयं से संभलना
वो कर्ता तो गढ़ता स्वयं से जहां को तो कवि से साहित्य को आयाम मिलता
प्रखर हो के चमको जहां को बता दो नहीं गम में डूबे हो वादा ये खुद से
सुबह शाम रोते.......

यही पक्ष बेहतर है संसार सृजन कला संस्कृति ज्ञान विज्ञान उत्तम
ये समुदाय अपना ( कक्स्टिसम नहीं कवि समुदाय है) बुलंदी को छूता  रचे काव्य सुंदर  फुहड़ता से उत्तम
जवानों के सम्मान में वीर बेहतर कि श्रृंगार रूपक  हो अतिशयोक्ति बेहतर
करुण रौद्र या हो विभत्स नाद  गूंजे हो मुखरित आवाजें कलम से हमारे
सुबह शाम रोते.......

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धूप छाँव सा जीवन

  खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा  जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल  तले नभचर  ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा

अध्यात्म एक रहस्य

  अध्यात्म एक रहस्य अध्यात्म रहस्य अति गूढ़ है,अपनी मति से जान जितनी आंतरिक यात्रा, उतनी ही पहचान अध्यात्म अलौकिक ज्ञान है ,विज्ञान फेल हो जाय स्वांसों की  इस डोर को , पकड़ सके ना कोय साधना के आकाश में प्राण-अपान के बीच योगी साधक ,साधिका ,साधे प्राण की डोर स्वेच्छा मृत्यु सहज योग, काल खड़ा जब पास काल के धावा बोलते , योगी हो लवलीन जल समाधि राम लें लक्ष्मण सरयू आये वाणशैया पर लेटे ही भीष्मपितामह जाये विवेकानंद समाधि में प्राण साध जग छोड़े गुरु मिले सम परमहँस , सहज योग तब होय अध्यात्म सहज क्रिया-कर्म, तंत्र-मंत्र ना जान भूत-प्रेत ,सब देवता , मोक्ष तत्व से दूर मानव का तन दुर्लभ है , मिले ना बारम्बार टूटा हुआ पत्ता नहीं , कभी शाख पर आये लाख़ 84 जन्म  है ,  जीव काल  का  ग्रास आत्मज्ञान जब तक नहीं, नर ना तरे भव पार।।

Deep pain पीड़ा

  पीङा क्या है ?क्या यह मात्र  आभास है जो हमें प्रतीत होता है यह किस प्रकार का एहसास होता है जिसे हम महसूस करते  हैं जिसके उग्र स्वरुप में समाकर दिल रोता है ,आत्मा कराहती है एवं हमारे व्यवहार में परिवर्तन दीखता है चूंकि यह संभव है की इस दर्दनाक अनुभूति को कोई नहीं भूल सकता है जहन में कैद हो जाती हैं जिसका प्रभाव हम अपने नियमित जीवन में देखते हैं महसूस करते हैं।  पीङा एक सूक्ष्म प्रभाव है मन पर जो मानव को आहत करता है बारंबार मानव हृदय टूटता बिखरता और जुङता है एक सूक्ष्म प्रक्रिया के रूप में हमारे कल्पना में सोच में हर पल में समाहित होकर हमें वेदना से व्यथित करता जाता है क़ि हमारे नियमित कार्यशैली प्रभावित होती है। क्या कोई किसी शक्श के पीड़ा का अनुमान लगा सकता है? पर सवाल यह है कि कैसे ? यदि वह व्यक्ति स्वयं उस स्थिति से जूझ चूका हो वह बेहतर समझ सकता है परंतु आज के समय में किसी के पास इतना समय होगा किसी का दर्द साझा करने का! शा यद् नहीं। यदि हम विचार करें तो प्रश्न यह उठता  है कि पीङा क्या शारीरिक  होती है या केवल मात्र मानसिक ? जिसका आभास केवल जागृति में है य...