टिमटिमाता सा इक तारा
स्वांसो की ङोर थामे हुए
अनेक आशाएँ मन मे लिए
जीवन जीने की चाहत
अपनों का साथ पाने को
बिखर रहे अरमान उसके
परंतु कौन समझ पाता
हसरतें वो चाहतें अधूरी
काश वह कुछ कह पाता
चाहतें जाहिर कर पाता
जीवन की ङोर टूटने को था
साथ जहाँ से छूटने को था
परंतु उसे जाने का गम नहीं
वह जान गया कोई अपना नहीं
अकेला है अकेला ही चला
अंतिम समय सभी ने देखा
टूटता हुआ इक मूक सा तारा।
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