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श्रीकृष्ण द्वारा राधा को गोलोक की स्मृतियों को याद दिलाना




प्राणप्रिया , सुनो बालसखी,  मैं प्रेम निवेदन करता हूं ,
आंसू की धारा रोक लो तुम मेरे पथ में बाधक मानता हूं।।

नहीं कहूंगा  निष्ठुर बनने को नहीं कहूंगा मुझसे रूठो तुम,
 जरा धैर्य धरो मैं कहता हूं अब विचलित ना हो जाना  तुम।।

 राधा के मन में हलचल है  अंतस तूफान  भयंकर है ,
नयनों से प्रश्न छलकते हैं शंका मन राधे निरंतर है ।।

मां राधा कठिन परीक्षा दे तो विधाता कटघरे प्रश्न घिरे ,
कान्हा बोले  हतप्रभ ना हो ,तुम अयन से करो विवाह प्रिये।।

राधा बोली क्या पाप किया जो  स्वयं से दूर किया मुझको,
इस मृत्युलोक पर आने  की  यही सजा दिया तुमने मुझको।।

तुम स्मरण करो गोलोक प्रिये श्रीदामा संग जब उलझी थी,
 दोनो ने श्राप श्राप खेला तब मति क्रोधाग्नि में झुलसी थी।।

निर्धन ब्राम्हण का श्राप लगा श्रीदामा भूलोक में दुखी रहा,
तुम शत वर्षो का विरह सहो उस श्राप से  बिसरी स्मृति रही ।।

हम दोनो  का प्रेम अमरता है संग हो ना हों मन  तार जुड़े ,
अज्ञानतावश  दो शरीर कहे वह प्राणी नर्क के द्वार  पड़े।।

मेरा मत अकाट्य समझना तुम मानव लीला में सहायक हो,
 राधा बोली  मेरे बाल सखा  प्रियतम भक्तो के तारक  हो।।

एक वचन मुझे दो मिलने का श्रीचरणों का दर्शन दोगे तुम,
मेरे मन में कर्म में पूजा में  जीवन में सिर्फ रहोगे तुम ।।

राधा मुरली दोऊ पूरक है जस राधा कृष्ण एक मूरत हैं ,
यह अंश अयन कृष्णा ही है छलिया जग उसकी माया है।।

मुस्कान सजाए होठों पर वचनों को निभाने की बारी है ,
किंतु प्रणय सूत्र में बंधने को राधा की विवशता जारी है ।।

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