त्यौहार हमारे जीवन मे
हर साल ही आते जाते हैं
संदेश कोई दे जाते हैं
हमें याद सदा ये दिलाते हैं
बुराई पर अच्छाई की जीत का
ये त्यौहार ही साक्षी बनते हैं
होलिका का असफल प्रयास
प्रहलाद की याद दिलाते हैं
दिलों के बीच की दूरियाँ को
सब भूलकर गले लग जाते हैं
विविध व्यंजन से थाल सजा
हम मंगल खुशियाँ मनाते हैं
त्यौहार हमारे जीवन में
हर साल ही आते जाते हैं
"गायत्री शर्मा"
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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