क्यों आती हैं बाधाएँ जीवन में
क्यों ये कदम लङखङा जाते हैं
क्षण भर तनहा पाकर खुद को
व्याकुल मन क्यों हो जाता है
चाहतें क्यो कभी खत्म ना होती
पाकर सारे जहाँ की खुशियाँ
फिर भी उदासी ओढे हुए हैं
टूटकर बिखर ना जाना कहीं
अश्क भी आँखो मे न ठहरते
कैसे संभालकर गम रखोगे
सोचो जरा इस क्यों के पीछे
हम ही कारण क्यों होते हैं
गमों को अपने भूल कर तुम
हंसते हुए बाधाएँ पार करो
"गायत्री शर्मा"
खुशियों से भरा हो लाखों पल ,कहीं नैन नमी से युक्त रहे झरझर बरखा जो बून्द पड़े , फिर भी अंगना हो अनल तले नभचर ख़ग दाना- दाना को ,अन्न नीर बिना जैसे तरसें विचरे नभः में पंखे लहरा , उन्मुक्त गगन से दूर चले जो क्षितीज दिखे पंखों के परे ,भानू किरणों से तपता रहा अंकित जो करूँ दुःख का बादल ,चहुँ ओर घिरे पर भीग रहे ना उड़ पाया न ठहर सका, हर तरफ ही नीड़ तलाश रहा बेबसी के काले बादलों ने ,सपनों की उड़ानें रद्द कर दी चंचल ऋतुओं का क्या कहने,बेवक्त मिजाज बदल बैठे बेमानी लगे सावन भी उसे ,वो मयूर नहीं जो थिरक सके पंखें भीगी नम नैन हुए, किस ओर दिशा में नीड़ बसे। गायत्री शर्मा
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